बंगाल में SIR पर उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई याचिका

नई दिल्ली, एजेंसी। बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) के कारण मताधिकार से वंचित लोगों की विस्तृत जानकारी साझा करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है।बंगाल प्रदेश कांग्रेस की एसआइआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस ने वकील नेहा राठी के माध्यम से दाखिल इस याचिका में चुनाव आयोग, बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य सरकार को एसआइआर से संबंधित विस्तृत डाटा सार्वजनिक करने के निर्देश देने की मांग की है।चुनावों पर पड़ा SIR का असरयाचिका में आरोप लगाया गया कि विधानसभा चुनावों से ठीक पहले राज्य में एसआइआर कराए जाने का चुनावों के परिणाम पर प्रभाव पड़ा। यह याचिका ऐसे समय में दायर की गई है जब हाल ही में शीर्ष अदालत ने एसआइआर को सही ठहराया था।याचिका में चुनाव आयोग, बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य सरकार को पक्षकार बनाते हुए यह निर्देश देने की मांग की गई कि वे एसआइआर के दौरान दावों और आपत्तियों के चरण और बाद के चरणों में प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में जमा, स्वीकार और अस्वीकार किए गए फॉर्म 6 (नाम जोड़ने के लिए) और फॉर्म 7 (नाम हटाने के लिए) आवेदनों की संख्या के बारे में जानकारी दी जाए।प्रत्येक विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित मामलों की संख्या के बारे में जानकारी भी मांगी गई है।

गौरतलब है कि भाजपा ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल किया है। याचिका के अनुसार बंगाल में दावों और आपत्तियों के चरण के दौरान नामों को शामिल करने के लिए 9.64 लाख आवेदन और नाम हटाने के लिए 99,118 आवेदन प्राप्त हुए थे, लेकिन 28 फरवरी, 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में केवल 1.82 लाख नाम ही शामिल किए गए थे।याचिका में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार बनाए गए अपीलीय तंत्र का जिक्र करते हुए कहा गया है कि मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने और हटाने को चुनौती देने वाले मामलों की सुनवाई के लिए 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों का गठन किया गया था, लेकिन सात अप्रैल को न्यायिक समिति द्वारा तैयार की गई मानक संचालन प्रक्रिया को सार्वजनिक नहीं किया गया।

इस मानक संचालन प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए।साथ ही अपील प्रक्रिया के लिए बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी में सरल गाइडलाइंस जारी की जाएं।याचिका में दावा किया गया कि अपील दाखिल करने, सुनवाई करने, नोटिस जारी करने और निपटान के लिए समय-सीमा के संबंध में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दिशानिर्देशों के अभाव ने प्रक्रियात्मक अनिश्चितता पैदा कर दी है।डाटा और मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए बताया गया है कि न्यायाधिकरणों के समक्ष दायर की गई लगभग 25 लाख अपीलों में से केवल कुछ अपीलों का निपटारा हो सका है।

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