नई दिल्ली, एजेंसी। फ्रांस में हो रहे व्यापक प्रदर्शनों ने सामाजिक असंतोष, युवा राजनीति और कानून-व्यवस्था के बीच टकराव को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। महंगाई और जीवनयापन की बढ़ती लागत से नाराज लोगों, बेहतर शैक्षणिक परिस्थितियों की मांग कर रहे विद्यार्थियों, पीली जैकेट आंदोलन से जुड़े लोगों, ट्रेड यूनियनों और वामपंथी राजनीतिक नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश के बीच कई शहरों में प्रदर्शन हुए। आयोजकों ने इसमें 8 लाख लोगों के शामिल होने का दावा किया, जबकि फ्रांस के गृह मंत्री लॉरां नुनेज के अनुसार प्रदर्शनकारियों की संख्या 5.5 लाख थी। लेकिन बड़े जनसमूह के साथ सामने आई हिंसा, संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने और लूटपाट की घटनाओं ने आंदोलन के उद्देश्य और उसके राजनीतिक परिणामों पर सवाल खड़े कर दिए। ट्रेड यूनियनों और वामपंथी राजनीति को साथ लाने की कोशिश, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से अलग पुलिस से भिड़ने वाले समूहों ने माहौल पूरी तरह बिगाड़ दिया है। सवाल यह है कि युवाओं के असंतोष का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है और हिंसा से किसे राजनीतिक लाभ मिल सकता है? कुछ दक्षिण एशियाई देशों की तरह यह तख्तापलट की साजिश तो नहीं।





