नई दिल्ली, एजेंसी। लोकसभा सीटों के परिसीमन पर चर्चा गर्म है। संविधान कहता है कि लोकसभा सीटों का परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होना चाहिए। लेकिन, कई राजनीतिक दल और कुछ राज्य जनसंख्या वृद्धि दर भिन्न होने के आधार पर सिर्फ जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का विरोध कर रहे हैं।विधि विशेषज्ञों की राय देखें तो ज्यादातर मानते हैं कि लोकसभा सीटों का परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होना चाहिए और संविधान सिर्फ जनसंख्या के आधार को ही मानता है। हालांकि, कुछ की राय भिन्न है। उनका कहना है कि जनसंख्या एक आधार हो सकती है, लेकिन एकमात्र नहीं।अन्य परिस्थितियों और पहलुओं पर भी गौर किया जाना चाहिए।लोकसभा में सीटों की संरचना, प्रतिनिधित्व और जनगणना के बारे में संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में प्रविधान दिया गया है। इसका सार यही है कि सीटों का बंटवारा जनसंख्या के हिसाब से होगा और यह हर जनगणना के बाद होगा। जनसंख्या के आधार पर परिसीमनस्थिति 1976 के बाद बदली जब सीटें फ़्रीज हो गईं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसआर ¨सह कहते हैं कि जनसंख्या के अलावा भला क्या आधार हो सकता है। परिसीमन जनसंख्या के आधार पर ही होना चाहिए। और किसी भी स्थिति में परिसीमन पर रोक नहीं लगनी चाहिए।सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन तो कहते हैं कि परिसीमन में राज्य की जीडीपी ग्रोथ और टैक्स कंट्रीब्युशन यानी आर्थिक प्रगति आधार होनी चाहिए। लेकिन वैद्यनाथन की बात से वरिष्ठ वकील विकास पाहवा इत्तफाक नहीं रखते। पाहवा कहते हैं कि इकोनमिक कंट्रीब्युशन यानी सिर्फ कमा कर देना आधार नहीं हो सकता।क्योंकि ऐसा होने पर तो सिर्फ कमाने वाले ही देश पर शासन करेंगे, फिर लोकतंत्र कहां हुआ। कई विशेषज्ञ पाहवा से सहमत हैं। उनका मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए नीति बननी चाहिए। उसे ठीक से लागू भी किया जान चाहिए। इसी तरह आर्थिक विकास से राज्य भी खुशहाल होते हैं और जानता भी। लेकिन प्रतिनिधित्व को आर्थिक स्थिति से नहीं जोड़ा जा सकता है।





