तेल अवीव/तेहराअमरीका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर इस हफ्ते फिर बैठक हो सकती है। इसके लिए इस्लामाबाद और जेनेवा संभावित जगह मानी जा रही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमरीका के अधिकारी आपस में दूसरी बैठक को लेकर बात कर रहे हैं। यह बैठक 21 अप्रैल से पहले हो सकती है। न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने अमरीका के साथ इस्लामाबाद वार्ता में यूरेनियम संवर्धन को अस्थायी रूप से पांच साल के लिए रोकने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन कई मुद्दों पर मतभेद बने रहने के कारण कोई समझौता नहीं हो सका। ईरान ने संवर्धन गतिविधियों को सीमित अवधि के लिए रोकने का प्रस्ताव दिया, जो अमेरिका की लंबे समय (करीब 20 वर्ष) तक रोक की मांग से कम था।
ईरान पहले भी इसी तरह का प्रस्ताव जिनेवा वार्ता के दौरान दे चुका था और इस्लामाबाद वार्ता में इसे फिर सामने रखा गया। व्हाइट हाउस ने संकेत दिया है कि अगले दौर की वार्ता पर विचार किया जा रहा है, हालांकि इसकी रूपरेखा अभी तय नहीं हुई है। इसी बीच अमरीकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरान के साथ समझौते को लेकर अब गेंद तेहरान के पाले में है। अमरीका ने अपनी शर्तें स्पष्ट कर दी हैं और अब आगे बढऩा ईरान पर निर्भर है।
वेंस के मुताबिक इस्लामाबाद में हुई वार्ता में कुछ प्रगति हुई, लेकिन अंतिम समझौता नहीं हो सका। अमरीका ने परमाणु हथियार नहीं बनाने को लेकर अपनी शर्तें साफ रखी हैं। उन्होंने कहा कि अगर ईरान इन शर्तों को मानता है, तो अमेरिका उसे सामान्य देश की तरह ट्रीट करने को तैयार है। ईरान ने कहा है कि अमरीका और इजरायल के हमलों से उसे करीब 270 अरब डॉलर (25 लाख करोड़ रुपए) का नुकसान हुआ है। ईरान ने साफ किया है कि वह शांति के लिए तैयार है, लेकिन उसकी कुछ शर्तें हैं। ईरान चाहता है कि उसे यूरेनियम एनरिचमेंट का अधिकार मिले, उस पर लगे सभी प्रतिबंध हटाए जाएं और युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई की जाए। इसी बीच ईरानी राष्ट्रपति ने संकेत दिया कि अगर अमरीका अपनी दबाव वाली नीति छोड़ता है और ईरानी जनता के अधिकारों का सम्मान करता है, तो समझौते का रास्ता निकल सकता है। की बात कही है, जिससे तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ सकता है।
चीन ने ईरान के बंदरगाहों पर अमरीका की कथित नाकेबंदी को ‘खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना’ बताया है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि दुनिया को ‘जंगल के कानून’ (ताकतवर जो चाहे, वे करें) वाली हालत में नहीं जाने देना चाहिए। नियमों को सब पर बराबर लागू किया जाना चाहिए, न कि अपनी सुविधा के हिसाब से। इसी के साथ चीन के राष्ट्रपति ने मिडल ईस्ट में शांति के लिए चार सूत्रीय प्रस्ताव दिया है। इसमें देशों के बीच शांतिपूर्ण तरीके से साथ रहने के सिद्धांत को बनाए रखना, हर देश की संप्रभुता का सम्मान करना, विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाकर चलना शामिल है।





