नई दिल्ली, एजेंसी। चीन जल्द ही चांद के लिए अपना नया चंद्र मिशन लॉन्च करने वाला है। जानकारी के मुताबिक, अपने चांगई-7 मिशन को चीन सोमवार सुबह से लेकर अगले कुछ दिनों में सही मौका देखकर लॉन्च कर सकता है। चीन का यह मिशन इस लिए भी अहम है, क्योंकि इसके जरिए वह चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अपना रोवर उतारना चाहता है, जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती। मजेदार बात यह है कि भारत करीब तीन साल पहले ही चांद के इस इलाके में अपने रोवर की सफल लैंडिंग कराने वाला पहला देश बन चुका है। यानी चीन जिस रेस में पहले ही पिछड़ चुका है, अब वहां बराबरी की कोशिश में जुटा है। इस मिशन को लॉन्ग मार्च-5 वाई14 रॉकेट के जरिए हेनान प्रांत के वेनचांग स्पेस लॉन्च साइट से प्रक्षेपित किया जाएगा।
इसके प्रक्षेपण की संभावित समय-सीमा 24 अगस्त से 31 अगस्त 2026 के बीच की है। यह मिशन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद शेकलटन क्रेटर के किनारे पर उतरेगा। यह सौर मंडल के सबसे ठंडे स्थानों में से एक है, जहां तापमान -203 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है।चीन के इस मिशन की खास बात यही है कि मिशन को मुख्यतः चांद की सतह पर पानी की खोज के लिए लॉन्च किया जा रहा है, इसलिए इसमें एक हॉपर भी भेजा जाएगा, जो कि ऐसा समर्पित हॉपर उपयोग करने वाला यह दुनिया का पहला मिशन होगा।यह मिशन चीन के चंद्र अन्वेषण के चौथे चरण का हिस्सा है। यह 2030 तक चंद्रमा पर पहले चीनी मानव लैंडिंग के लिए आधार तैयार कर रहा है और चांगई-8 (संभावित वर्ष 2028) के साथ मिलकर चीन के इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन (आईएलआरएस) के निर्माण में मदद करेगा।चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मिशन भेजने और वहां पानी की खोज करने की कोशिश में पहले भी कई देश कोशिश कर चुके हैं। हालांकि, इनमें अधिकतर देश अब तक सफल नहीं हुए हैं। सिर्फ भारत ही अब तक वह देश रहा है, जिसने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक अपना रोवर उतारा है और दक्षिणी ध्रुव पर पानी की खोज को आगे बढ़ाया है।
भारत: भारत का चंद्रयान-3 मिशन अगस्त 2023 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरने वाला दुनिया का पहला मिशन बना। इसने वहां की मिट्टी के तापमान की रीडिंग के जरिए दक्षिणी ध्रुव की सतह पर पानी की मौजूदगी के बेहद अहम नए प्रमाण खोजे। इससे पहले, भारत के चंद्रयान-1 मिशन ने भी चंद्रमा के ध्रुवीय क्रेटरों (गड्ढों) में जल-बर्फ होने के सबूत दिए थे।रूस: साल 2023 में ही रूस ने भी दक्षिणी ध्रुव पर जमी हुई बर्फ की खोज के लिए अपना लूना-25 मिशन भेजा था। हालांकि, यह यान नियंत्रण खो देने के कारण चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कोई वैज्ञानिक डेटा एकत्र नहीं कर सका।
अमेरिका: नासा ने सीधे तौर पर सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग से इतर अलग-अलग ऑर्बिटर और इम्पैक्ट मिशन्स के जरिए इस क्षेत्र का अध्ययन किया है। नासा के क्लेमेंटाइन (1994) और लूनर प्रॉस्पेक्टर (1998) शुरुआती मिशनों में से थे जिन्होंने चंद्रमा पर जल-बर्फ होने के संकेत खोजे थे।





