नई दिल्ली, एजेंसी। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में अब एक बड़ा राजनीतिक सवाल चुपचाप घूम रहा है कि क्या तृणमूल कांग्रेस धीरे-धीरे टूटने की ओर बढ़ रही है? क्या बंगाल में महाराष्ट्र जैसा पॉलिटिकल माहौल बन सकता है, जहां शिवसेना या NCP दो गुटों में टूट गई थी?
यह चर्चा अभी भी अंदाजे वाली लग सकती है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के अंदर हाल के घटनाक्रम ने ऐसे सवालों को नजरंदाज करना नामुमकिन बना दिया है. अब खुलेआम पॉलिटिकल गपशप, अंदरूनी अविश्वास, साफ बगावत, और लीडरशिप के कुछ हिस्सों और पार्टी के जमीनी स्तर के प्रतिनिधियों के बीच बढ़ती दूरी है. जाहिर है, इससे इस बात पर और ज्यादा पॉलिटिकल अंदाजे लगने लगे हैं कि क्या TMC को आखिरकार ऑर्गेनाइजेशनल टूट का सामना करना पड़ सकता है?
चुनाव नतीजों के बाद से बढ़ी नाराजगी !
2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से यह बातचीत और तेज हो गई है. 4 मई को नतीजों के ऐलान के बाद से, कई सांसद, विधायक, पार्षद और जिला स्तर के नेताओं ने पार्टी लीडरशिप से नाराजगी जाहिर की है.
दिलचस्प बात यह है कि उनकी ज्यादातर बुराई मुख्य रूप से ममता बनर्जी पर नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी और पार्टी स्ट्रक्चर के अंदर IPAC जैसे ऑर्गेनाइजेशन के बढ़ते असर पर की गई है. कई नेता अब खुलेआम कह रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक पॉलिटिकल कल्चर बदल गया है. उनके मुताबिक, फैसले लेने का तरीका तेजी से सेंट्रलाइज्ड हो गया है और यह कंसल्टेंट्स, सर्वे सिस्टम और बाहरी पॉलिटिकल स्ट्रेटजिस्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गया है. कई नेताओं को लगता है कि पार्टी और आम वर्कर्स के बीच ऑर्गेनिक पॉलिटिकल कनेक्शन कमजोर हो रहा है.





