नई दिल्ली, एजेंसी। अहमदाबाद विमान हादसे की पहली बरसी पर एक बुजुर्ग दंपति की दर्दनाक कहानी सामने आई है, जिनकी बेटे से मिलने की पहली हवाई यात्रा ही आखिरी बन गई। समय बड़ी क्रूरता से आगे बढ़ता जाता है, जबकि इंसान का दिल अक्सर पीछे उसी दर्द में अटका रह जाता है। ठीक एक साल पहले अहमदाबाद के आसमान में एक ऐसा खौफनाक मंजर दिखा था जिसने भारतीय विमानन के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया और एक ही पल में सैकड़ों जिंदगियों को तबाह कर दिया।जब वह विमान हॉस्टल कॉम्प्लेक्स पर गिरा, तो उसने सिर्फ एक हवाई जहाज को नष्ट नहीं किया। उसने हवा और जमीन दोनों जगह मौजूद परिवारों के भविष्य, सपनों और सुरक्षित आशियानों को पल भर में राख कर दिया। आज, हादसे का भौतिक मलबा भले ही हटा दिया गया हो, मोहल्ले से एंबुलेंस के सायरन की आवाजें शांत हो गई हों और न्यूज साइकिल आगे बढ़ गई हो। लेकिन पीछे छूट गए लोगों के लिए कैलेंडर के पन्ने पलटने का कोई मतलब नहीं है।उनके लिए, दुनिया आज भी उसी दोपहर के धुएं और चीखों के बीच स्थायी रूप से जमी हुई है। यह एक ऐसा सामूहिक आघात है जो अब एक गहरे और अकेलेपन से भरे दैनिक यथार्थ में बदल चुका है।एक परिवार के उजड़ने की कहानीइस त्रासदी ने कई परिवारों को पूरी तरह से तोड़ दिया। खेड़ा के एक बुजुर्ग दंपति रजनीकांत और पुष्पाबेन दर्जी को हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए अपने उस बेटे की बाहों में पहुंचना था, जिसने ब्रिटेन में उनके लिए सपनो सी जिंदगी तैयार की थी। इसके बजाय, जीवन भर के कड़े संघर्षों को पार कर अपने बेटे को डॉक्टर बनाने वाले इस दंपति का सफर अहमदाबाद के कंक्रीट पर खत्म हो गया।





