लेखन हमेशा दिल से समर्पित रहा : नैंसी आहूजा

नैंसी आहूजा, एक ऐसा नाम जो लेखन और कविता की दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है, का जन्म 1 दिसम्बर, 1987 को देहरादून की शांत वादियों में हुआ। एक उच्च शिक्षित पेशेवर, नैंसी ने MBA की डिग्री प्राप्त की है, लेकिन उनका हृदय हमेशा से ही लेखन के प्रति समर्पित रहा है। लेखन का उद्देश्य: जीवन, प्रेम और समाज; नैंसी की लेखन रुचि में जीवन, प्रेम, भावनाएं, सामुदायिक चिंताएं और सामाजिक कारणों पर शायरी व नज़्म शामिल हैं।

उनका लेखन 90 के दशक और 2000 के दशक, दोनों को जीने वाली पीढ़ी के एक ताजा दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है। नैंसी का उद्देश्य अपने लेखन के माध्यम से एक व्यापक दृष्टिकोण वर्ग तक पहुँचाना और युवाओं को प्रेरित करना है, ताकि वे दुनिया को एक नई और सकारात्मक दृष्टि से देख सकें। नैंसी की कविताएं केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि एक अनुभव हैं, एक यात्रा हैं, जो पाठकों को सोचने, महसूस करने और प्रेरित होने के लिए आमंत्रित करती हैं। नैंसी आहूजा पाठकों को एक ऐसी दुनिया में ले जाएगी जहाँ शब्द भावनाओं के सागर में गोता लगाते हैं, और जहाँ हर कविता एक नई कहानी कहती है।

“हम बड़े हो गये हैं”
हाँ, हम अब बड़े हो गये हैं,
के रिश्ते कुछ यूँ खट्टे हो गये हैं,
रिमोट के लिये झगड़ा तो छोड़ो,
हमें साथ टी.वी देखे बरसों हो गये हैं।

बिस्तर भी अब ख़ुद ही बना लेते हैं,
और कपड़ों को छितराएं कहाँ?
के हमारे कमरों के अब बँटवारे हो गये हैं।

जुराबें सिमटा कर रखते हैं अलमारी के कोने में,
और फ़्रिज तुम्हारा छोड़ देते हैं खाली कमरे सा..,
के एहसास है मिठा देख तुम रह न पाओगी,
चखोगी और हमें भी चखाओगी।

बाथरूम भी सूखा छोड़ आते हैं अब,
के निकलने से पहले तुम्हारा ख़्याल आता है,
जानते हैं.. तुम्हारा कदम डगमगाता है।

चाहते हैं दरवाज़े पर घंटी बजा कर तुम्हें सरप्राइज दें,
मगर डरते हैं तुम सह न पाओगी,
आँसू देख हमारे, तुम भी रो जाओगी।

हाँ! अब हम बड़े हो गये हैं!
कैसे तुम्हारा आँचल मेरी मुट्ठी से सरक गया,
बड़े होने के चक्कर में! पता ना चला,
कब तुम्हें हार गया मैं जीत की टक्कर में।

मैंने कहाँ जाना मेरा तुतलाना तुम्हें इतना प्यारा था,
पर मुझे तो दौड़ती-सी ज़िन्दगी में फ़र्स्ट आना था।

सही कहा माँ! हम अब बड़े हो गये हैं,
के हमारे सारे अपने पूरे हो गये हैं।

पर न मालूम था इन सपनों की क़ीमत
अपनों को देकर चुकानी होगी,
माँ मेरी बैठी होगी अकेली…
और मुझे दुनिया लुभानी होगी।

— नैंसी आहूजा

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