<p style=”text-align: justify;”>सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (23 जुलाई, 2025) को उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर में नोएडा प्राधिकरण की ओर से अधिगृहीत भूमि के लिए दिए गए मुआवजे पर अपना आदेश वापस ले लिया और कहा कि मुआवजा धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया था और इसे अमान्य होने के कारण रिकॉर्ड से हटा दिया जाना चाहिए.</p>
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<p class=”pf0″><span class=”cf0″>बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘</span><span class=”cf0″>यह ध्यान देना जरूरी है कि </span><span class=”cf1″>'</span><span class=”cf0″>धोखाधड़ी से सबकुछ साबित हो जाता है</span><span class=”cf1″>’ </span><span class=”cf0″> का सिद्धांत सिर्फ निचली अदालतों की ओर से दिए गए फैसलों की जांच तक ही सीमित नहीं है, लेकिन अगर हमारे सामने ऐसा कोई मामला आता है तो इस कोर्ट के निर्णयों को उजागर करना भी शामिल हो सकता है.'</span></p>
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<p style=”text-align: justify;”>जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच मामले पर सुनवाई कर रही थी. बेंच ने कहा कि भूमि के स्वामित्व को लेकर विवाद पर फैसला सुनाया, जिसे 1997 में तीन व्यक्तियों रेड्डी वीराना, विष्णु वर्धन और टी सुधाकर ने खरीदा था और 2005 में नोएडा प्राधिकरण की ओर से अधिगृहीत किया गया था और अब यह सेक्टर 18 में नोएडा के वाणिज्यिक केंद्र का हिस्सा है.</p>
<p style=”text-align: justify;”>यह आरोप लगाया गया था कि वीराना ने सिविल अदालतों से लेकर हाईकोर्ट और 2022 में सुप्रीम कोर्ट तक विभिन्न न्यायिक मंचों के समक्ष कई कार्यवाहियों में धोखाधड़ी से भूमि के एकमात्र स्वामित्व का दावा किया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने वीराना को बढ़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश पारित किया था.</p>
<p style=”text-align: justify;”>वीराना पर आरोप है कि उन्होंने धोखाधड़ी से वर्धन और सुधाकर को हटा दिया और मुआवजे की राशि हड़प ली. विष्णु वर्धन ने वीराना के दावे का विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट के मई, 2022 के आदेश को वापस लेने का अनुरोध किया.</p>
<p style=”text-align: justify;”>जस्टिस दीपांकर दत्ता ने बेंच का फैसला लिखा. उन्होंने कहा कि धोखाधड़ी पर इस कोर्ट के अनेक निर्णयों से यह निष्कर्ष निकलता है कि धोखाधड़ी और न्याय एक साथ नहीं रह सकते.</p>
<p style=”text-align: justify;”>आदेश में कहा गया, ‘भले ही विष्णु ने समीक्षा के लिए आवेदन नहीं किया हो – उपरोक्त चर्चाओं के तार्किक परिणाम के रूप में – रेड्डी वीराना (2022 का फैसला) का निर्णय भी रेड्डी की ओर से धोखाधड़ी करके प्राप्त किया गया था, इसे भी रिकॉर्ड से मिटा दिया जाना चाहिए क्योंकि यह अमान्य है.'</p>
<p style=”text-align: justify;”>बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 28 अक्टूबर, 2021 के फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें वीराना को संपत्ति का एकमात्र मालिक स्वीकार किया गया था और मुआवजे को 152.04 रुपये प्रति वर्ग मीटर से बढ़ाकर 1,10,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर कर दिया गया था और कहा था कि धोखाधड़ी ने पूरी कार्यवाही को दूषित कर दिया है.</p>
<p style=”text-align: justify;”>सुप्रीम कोर्ट ने मामले को वापस हाईकोर्ट में भेज दिया और निर्देश दिया कि भूमि के अन्य दो मालिकों विष्णु वर्धन और टी सुधाकर को अतिरिक्त प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाया जाए.</p>





