काबूल, कश्मीर से मुंबई और पहलगाम तक हाफिज सईद ने कैसे फैलाया आतंक का खूनी नेटवर्क

इस्लामाबाद। लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज मुहम्मद सईद के खिलाफ भारत में कानूनी मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है। जुलाई 2026 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एएनआई) ने पहलगाम आतंकी हमले के मामले में सप्लीमेंट्री चार्जशीट में सईद का नाम शामिल किया।उस पर व्यक्तिगत रूप से और लश्कर-ए-तैयबा एवं उसके प्रॉक्सी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) के संस्थापक और प्रमुख के रूप में आरोप लगाए गए हैं। NIA ने 22 अप्रैल, 2025 को हुए इस हमले के पीछे सीमा पार की साजिश का जिक्र किया है, जिसमें 26 नागरिकों की जान गई थी। इसके बाद विशेष एनआईए अदालत ने सईद के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया।इसी बीच, मुंबई पुलिस ने 2008 के मुंबई आतंकी हमलों (26/11) में सईद और पाकिस्तान में रह रहे पांच अन्य आरोपियों के खिलाफ इन एब्सेंशिया में मुकदमा चलाने की कार्यवाही शुरू कर दी है। इस सूची में सईद, लश्कर का ऑपरेशंस चीफ जकी-उर-रहमान लखवी, साजिद मीर, अबू अलकामा, असीम उर्फ अबू काहाफा और मेजर अब्दुर रहमान पाशा शामिल हैं।

पुलिस ने इंटरपोल के माध्यम से उद्घोषणा आदेश तामील कराने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से भी संपर्क किया है। 17 साल के अंतराल वाले ये दोनों मामले लश्कर के इतिहास के विभिन्न चरणों को एक साथ लाते हैं। लेकिन लश्कर की शुरुआत न तो कश्मीर में हुई थी और न ही हाफिज सईद वहां एक उग्रवादी नेता के रूप में उभरा था।अफगान जिहाद से पहलगाम तक का सफरलश्कर-ए-तैयबा के चार दशक के इतिहास को बदलते युद्धक्षेत्रों और संगठनात्मक ढांचे के रूप में देखा जा सकता है। अफगान जिहाद के दौरान पड़ी इसकी नींव, कश्मीर में इसका विस्तार और जमात-उद-दावा के रूप में इसके छद्म अस्तित्व ने इसे लगातार बचाए रखा। मुंबई हमलों ने साबित किया कि यह नेटवर्क कश्मीर से बाहर भी भयंकर तबाही मचा सकता है।अब पहलगाम जांच ने कहानी को वापस उसी क्षेत्र में ला दिया है जहां लश्कर ने अपनी शुरुआती पहचान बनाई थी।

सईद के खिलाफ हालिया कानूनी कार्यवाही उस लंबे इतिहास का परिणाम है, जिसकी शुरुआत मुंबई या पहलगाम से नहीं, बल्कि 1980 के दशक के अफगान जिहाद से हुई थी।कैसे पड़ा लश्कर-ए-तैयबा की नींव?1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के आक्रमण ने ऐसा माहौल बनाया जिसमें पाकिस्तान और मुस्लिम दुनिया के अन्य हिस्सों से इस्लामी नेटवर्क तेजी से फले-फूले। फिलिस्तीनी विद्वान अब्दुल्ला आजम ने विदेशी स्वयंसेवकों को अफगान जिहाद के लिए एकजुट किया। इसी दौरान, आजम ने सऊदी अरब में पढ़े पाकिस्तानी सुन्नी विद्वान हाफिज सईद के साथ काम किया।दोनों ने मिलकर मरकज-उद-दावा-वल-इरशाद (एमडीआई) की स्थापना की, जो जिहाद के समर्थन के साथ-साथ धार्मिक प्रचार का काम करता था। MDI ने अफगानिस्तान में अपने प्रशिक्षण ढांचे विकसित किए और 1980 के दशक के अंत में लश्कर-ए-तैयबा इसी नेटवर्क की सैन्य शाखा के रूप में उभरा।अफगान जिहाद ने ही इस संगठन को शुरुआती वैचारिक, मानव संसाधन और प्रशिक्षण का बुनियादी ढांचा प्रदान किया।लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना क्यों की गई?लश्कर का शुरुआती उद्देश्य अफगान जिहाद में भाग लेना और कश्मीर और भारत में जिहाद के लिए तैयारी करना था।

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