नई दिल्ली, एजेंसी। बांग्लादेश मूल की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन करीब 19 साल बाद एक बार फिर कोलकाता लौटी हैं। आज वे रवींद्र सदन में आयोजित कट्टरता-विरोधी कवि-लेखक सम्मेलन में हिस्सा लेंगी और अपनी कविताएं भी पढ़ेंगी। लंबे समय से कोलकाता को अपना दूसरा घर बताने वाली तसलीमा की यह वापसी इसलिए भी चर्चा में हैतसलीमा नसरीन का जन्म 1962 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मयमनसिंह में हुआ था। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई की और स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में काम करना शुरू किया। बाद में उन्होंने पूर्णकालिक लेखन को अपना पेशा बना लिया। महिलाओं के अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक कट्टरता पर उनके लेखन ने उन्हें दक्षिण एशिया की सबसे चर्चित लेखिकाओं में शामिल करा दिया। उन्होंने 40 से अधिक किताबें लिखी हैं, जिनका 30 से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उन्हें 1992 में ‘निर्वाचित कॉलम’ और 2000 में आत्मकथा ‘आमार मेयेबेला’ के लिए आनंद पुरस्कार मिला। 1994 में उन्हें मानवाधिकार के क्षेत्र में दिए जानेतसलीमा 1993 में प्रकाशित अपने उपन्यास ‘लज्जा’ से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं। इस उपन्यास में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को दिखाया गया था। किताब और उनके अखबारों में लिखे लेखों के कारण बांग्लादेश में उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, मौत की धमकियां मिलीं और फतवे जारी किए गए। हालात ऐसे बने कि 1994 में उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा और तभी से वह निर्वासन का जीवन जी रही हैं। उनका कहना रहा है कि धार्मिक कट्टरता की आलोचना करने के कारण उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा।तसलीमा कोलकाता कैसे पहुंचीं?बांग्लादेश छोड़ने के बाद तसलीमा ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई देशों में समय बिताया। उन्हें स्वीडन की नागरिकता भी मिली। करीब 10 साल विदेश में रहने के बाद वह 2004 में भारत आईं और कोलकाता में बस गईं। बंगाली भाषा और संस्कृति से गहरे जुड़ाव के कारण वह कोलकाता को अपना दूसरा घर बताती थीं और बंगाली अखबारों में नियमित लेख भी लिखती थीं।





